त्रेता युग की मान्यताओं को समेटे है बडागांव का मां मंशा देवी मंदिर
बागपत जनपद के बड़ागांव स्थित मां मंशा देवी मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है। त्रेता युग से जुड़ी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर नवरात्र के दिनों में भक्तों की विशेष श्रद्धा का केंद्र बन जाता है। दुर्गा अष्टमी पर यहां मां के दर्शन और पूजन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ और हरियाणा तक से भक्त मां के दरबार में माथा टेकने आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां मंशा देवी अवश्य पूरी करती हैं।
दुर्गा अष्टमी विशेष-
त्रेता युग की मान्यताओं को समेटे है बडागांव का मां मंशा देवी मंदिर
- रावण हिमालय से लेकर आया था मां की प्रतिमा, बड़ागांव में स्थापित होने की है मान्यता
- दिल्ली-एनसीआर, मेरठ और हरियाणा तक फैली है मंदिर की ख्याति, नवरात्र में लगता है मेला
खेकड़ा, तेजस न्यूज रिपोर्टर
बागपत जनपद के बड़ागांव स्थित मां मंशा देवी मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है। त्रेता युग से जुड़ी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर नवरात्र के दिनों में भक्तों की विशेष श्रद्धा का केंद्र बन जाता है। दुर्गा अष्टमी पर यहां मां के दर्शन और पूजन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ और हरियाणा तक से भक्त मां के दरबार में माथा टेकने आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां मंशा देवी अवश्य पूरी करती हैं।
रावण की तपस्या से जुड़ी है मंदिर की मान्यता
मंदिर समिति से जुड़े लोगों के अनुसार, मां मंशा देवी मंदिर का इतिहास त्रेता युग की मान्यताओं से जुड़ा है। कहा जाता है कि लंकापति रावण हिमालय से मां की प्रतिमा लेकर लंका जा रहा था। मां के चमत्कारों से प्रभावित रावण ने उन्हें लंका ले जाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां ने उसके साथ चलने की स्वीकृति दी, लेकिन शर्त रखी कि रास्ते में जहां भी प्रतिमा को जमीन पर रखा जाएगा, मां वहीं विराजमान हो जाएंगी। मान्यता है कि लंका जाते समय रावण बड़ागांव के समीप प्रतिमा का भार सहन नहीं कर सका और उसे जमीन पर रख दिया। इसके बाद प्रतिमा वहीं स्थापित हो गई। कहा जाता है कि इसी घटना के कारण गांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव पड़ा। पुरानी प्रतिमा खंडित होने के बाद उसके स्थान पर करीब 250 वर्ष पुरानी प्रतिमा स्थापित होने की जानकारी मंदिर समिति के लोग देते हैं। मंदिर में भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है।
सेठ लक्ष्मणदास जैन ने कराया था मंदिर का जीर्णाेद्धार
मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा बड़ागांव निवासी सेठ लक्ष्मणदास जैन की है। बताया जाता है कि अंग्रेजी शासन के दौरान किसी मामले में उन्हें तोप से उड़ाने की सजा देने की तैयारी की गई थी। मान्यता है कि उस समय देवी बाल रूप में उनके सामने प्रकट होती थीं और तीन बार प्रयास करने के बावजूद सेठ को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इसके बाद उनकी सजा माफ कर दी गई। इस घटना के बाद सेठ लक्ष्मणदास जैन ने मंदिर का भव्य निर्माण कराया था। मंदिर परिसर में मां मंशा देवी के अलावा भगवान विष्णु के दशावतार, राम दरबार, भगवान शिव परिवार, हनुमान जी, भैरव बाबा और राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। इससे मंदिर परिसर धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
नवरात्र में उमड़ते हैं श्रद्धालु
खेकड़ा कस्बे से करीब पांच किलोमीटर दूर ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के बड़ागांव कट के प्रवेश मार्ग पर स्थित यह मंदिर दूर से ही श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां दो बार मेला लगता है। इन दिनों मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती है। दुर्गा अष्टमी के अवसर पर भी मां के जयकारों से मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठता है। वर्षों पुरानी धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक कथाओं और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था के कारण मां मंशा देवी मंदिर क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बना हुआ है।